प्राकृतिक चिकित्सा में योगिक षट्कर्म क्या हैं
Kapalbhati

षट्कर्मों के अभ्यास से व्यक्ति के शरीर की शुद्धि के साथ-साथ आत्मा की भी शुद्धि होती है

धोति, वस्ती, नेति, लोलिकी, त्राटक, कपालभाति इन 6 कर्मों को षट्कर्म कहा जाता है।

धौति क्रिया

इस क्रिया में आमाशय और अन्न नलिका की सफाई होती है । इसकी तीन विधियां हैं पानी से , कपड़े से एवं वायु से।

इस अभ्यास से आमाशय के रोग दूर होते हैं अपच की बीमारी तथा पेट से संबंधित अन्य बीमारियां जैसे कब्ज, एसिडिटी इत्यादि विकार दूर होते हैं जिससे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है शुद्धि के पश्चात मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करता है।

दूसरी क्रिया है वस्ति क्रिया

यह एक योगिक एनिमा है गुदाद्वार से जल खींचना कुछ समय तक उसे अपने शरीर के अंदर बड़ी आत में रोककर रखना उसके बाद जल का निष्कासन कर देना। ठीक वैसे ही जैसा कि एनिमा में होता है अंतर केवल इतना है एनिमा में यही प्रिया एक यंत्र ट्यूब के सहारे होती है पर यहां पर यह क्रिया स्वाभाविक रूप से होती है।

यही क्रिया उचित मानी जाती है क्योंकि जब एनीमा ट्यूब या यंत्र से करते हैं तो कभी कभी जोर लग जाने से शरीर के अंदर खरोंच आ जाती है और घाव भी हो सकता है

क्योंकि वहां से निष्कासित पदार्थ निकलते हैं इसलिए उनसे विष फैल जाता है। इसलिए वस्ती क्रिया करने की सलाह दी जाती है क्योंकि इसमें किसी भी यंत्र का इस्तेमाल नहीं होता।

तीसरी क्रिया है नेति

इस क्रिया से नाक, कान और गले के सफाई करती है। यह एक बहुत ही सरल किया है एक नासिका से पानी डालना दूसरी से निकालना। यह नासिका के अंदर के साइनस को साफ कर देती है

जिन लोगों को साइनोसाइटिस, सिर दर्द , माइग्रेन आदि होते हैं या हमेशा सरदर्द रहता है या दृष्टि भी कमजोर होती आंखें जल्दी थक जाती हैं कुछ देर पढ़ने पर आंख में पानी आ जाता है , लाल हो जाती है या फिर दर्द हो जाता है।

इस क्रिया से पुराना नजला ठीक हो जाता है नाक कान आंख के आसपास विजातीय द्रव्य इकट्ठे नहीं होते है।

नौली क्रिया

जिसे लोलिकी भी कहते हैं यह उदर अंगों की मालिश तथा बल प्रदान करने वाली शक्तिशाली विधि है। लोलिकी का अभ्यास बहुत ही उपयोगी है। अपच, भूख में कमी, पेट में कीड़े होने पर इसका अभ्यास करना चाहिए ।

वायु दोष ठीक करने के लिए भी यह एक उपयोगी अभ्यास है।

पेट को विशेषकर बड़ी आंत के हिस्से को अंदर की ओर खींचकर उसको मांसपेशियों को एक विशेष ढंग से दाएं बाएं घुमाना एक कठिन क्रिया है परंतु नियमित अभ्यास से प्रत्येक व्यक्ति इस अभ्यास को साध सकता है।

इससे पाचन संस्थान के आंतरिक अंगों की मालिश होती है जिससे भोजन के पचाने में सहायता मिलती है।


त्राटक पांचवा अभ्यास

आंखों और तंत्रिका तंत्र के विकारों को दूर करने के लिए यह अभ्यास बहुत उपयोगी है यदि किसी आंख में या तंत्रिका तंत्र में कोई विकार उत्पन्न हो जाता है तो इसके लिए त्राटक बहुत उपयोगी है।

इसके के अभ्यास से निकट निकट दृष्टि दोष दूर दृष्टि दोष मायोपिया या आंखों के संबंधित अन्य रोग बहुत हद तक नियंत्रित रखे जा सकते हैं।

त्राटक करने के लिए ध्यान के किसी आसन में बैठकर लगभग 1 फुट की दूरी पर आंखों के ठीक सामने एक दिया या मोमबत्ती जलाएं अब इसको देखना है मोमबत्ती की लो दिखाई देगी परंतु बीच में काले रंग की रहती है एकटक देखते रहना है साथ ही शारीरिक स्थिरता भी रखनी है कोई हलचल नहीं होनी चाहिए।

इसका अभ्यास चश्मा लगाकर नहीं किया जाता।इसके संबंध में तीन बातें कही गई हैं प्रथम आंखों के रोगों को दूर करता है। दूसरा दिव्य दृष्टि उत्पन्न करता है तृतीय शांभवी सिद्ध होती है इसका आध्यात्मिक लाभ मिलता है।

छटा अभ्यास है कपालभाति है।

यह फेफड़ों , पेट, आमाशय, किडनी, लिवर आदि रोग पैदा नही होने देती। इससे शरीर विकार रहित बनता है। साथ ही कपाल शुद्ध होती है जिससे आंख नाक कान गले के रोग दूर होते रक्त शुद्ध होता है।