प्राकृतिक चिकित्सा का सिद्धांत – प्रकृति स्वयं चिकित्सा करती है

जब लोग सभी तरह की चिकित्सा करा लेते हैं और उनको आराम नहीं होता और उनका रोग पूर्ण रूप से असाध्य हो चुका होता है तब उस स्थिति में प्राकृतिक चिकित्सा की शरण में ही लोग आते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा में सभी रोग एक हैं, उनका कारण एक है, और उनकी चिकित्सा भी एक ही है।

जब हमारे शरीर में विजातीय द्रव्य एकत्रित हो जाते हैं तो वह अनेक रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। उनके अलग-अलग नाम दे दिए जाते हैं। सभी प्रकार के रोग वास्तव में एक ही होते हैं केवल उनके प्रकार में भिन्नता होती है। इसलिए इन सभी रोगों की एक ही चिकित्सा होती हैं।

जब हम प्राकृतिक चिकित्सा करते हैं तो चिकित्सा करते समय जिस रोग की चिकित्सा कर रहे हैं वह रोग तो ठीक होता ही है साथ में शरीर के संपूर्ण रोग भी दूर हो जाते हैं अर्थात संपूर्ण शरीर स्वस्थ हो जाता है। तो इससे यह सिद्ध होता है कि सभी रोग एक ही हैं उनका कारण और चिकित्सा भी एक ही है।

रोग उत्पन्न होने का कारण कीटाणु नहीं

यदि व्यक्ति नियमित रूप से सही ढंग से आहार ग्रहण करता है तो कीटाणु हमारे शरीर में प्रवेश कर ही नहीं सकते यदि हमारा खान-पान अनियमित और अप्राकृतिक होगा तो वह हमारे शरीर में असंख्य कीटाणुओं का रूप धारण करके हमें अवश्य रोगी बनाएंगे।

रोग के कीटाणु केवल उन शरीरों में ही संभव है जिनमें पहले से ही रोग का कारण विद्यमान है अर्थात विजातीय द्रव्य विद्यमान है। इसलिए हम कह सकते हैं कि कीटाणु रोग उत्पन्न करने का कारण नहीं होते क्योंकि शरीर की दूषित अवस्था ही कीटाणुओं का कारण होती है। या इसे आप इस रूप में भी कह सकते हो कि यदि आपका शरीर में विजातीय द्रव्य या गंदे द्रव्य एकत्रित हो गए हैं तो आपको कीटाणु प्रभावित करेंगे। यदि उन विजातीय द्रव्यों को शरीर से बाहर निकाल दिया जाए तो वही शरीर स्वस्थ हो जाएगा।

शरीर में निरंतर विजातीय द्रव्य पैदा होते रहते हैं जिसे हमारे शरीर के मल निष्कासक अंग जैसे आंत, गुर्दा, रोम छिद्र, फेफड़े शरीर से बाहर निकालते रहते हैं। जब किसी प्रकार से मल को बाहर निकालने का रास्ता नहीं मिलता, तब प्रकृति शरीर में उपस्थित विजातीय द्रव्य को बाहर निकालने के लिए उल्टी, दस्त, फोड़े फुंसी, जुखाम, बुखार आदि तीव्र रोगों का सहारा लेती है। इन रोगों को औषधियों से दबाना नहीं चाहिए। प्राकृतिक उपचार एवं उपवास आदि के द्वारा प्रकृति के इस कार्य में सहयोग करना चाहिए।

प्रकृति स्वयं चिकित्सा करती है

प्राकृतिक चिकित्सा में रोग की चिकित्सा नहीं की जाती अपितु रोगी के संपूर्ण शरीर की चिकित्सा की जाती है। इसमें प्रमुख रूप से जो रोग का प्रमुख कारण हैं उसकी चिकित्सा की जाती है। जब उस कारण को हटा दिया जाता है तो व्यक्ति का शरीर स्वस्थ हो जाता है।

जब लोग सभी तरह की चिकित्सा करा लेते हैं और उनको आराम नहीं होता और उनका रोग पूर्ण रूप से असाध्य हो चुका होता है तब उस स्थिति में प्राकृतिक चिकित्सा की शरण में ही लोग आते हैं। उस समय रोगी रोग से ही नहीं बल्कि उसको इलाज में दी गई दवाओं के जहर से भी बुरी तरह पीड़ित हो जाता है। इस प्रकार प्रकृति को शरीर के मुख्य रोग का इलाज करने के साथ ही दवाओं के जहर को भी शरीर से बाहर निकालना पड़ता है, जिनको वह व्यक्ति वर्षों से ले रहा था।

प्राकृतिक चिकित्सा से हमारा मन शरीर और आत्मा तीनों ही पूर्ण रूप से स्वस्थ होते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में जीवन के रहन सहन और प्राकृतिक खानपान के द्वारा शरीर को स्वस्थ किया जाता है।

आधुनिक चिकित्सा में यह माना जाता है कि रोग कोई बाहरी चीज है जिसने मनुष्य के शरीर पर आक्रमण कर दिया है इसलिए शक्तिशाली दवाओं के द्वारा रोगों को दबा दिया जाता है। इससे वे प्रत्यक्ष रूप से भले ही रोग के लक्षण समाप्त हो गए हो परंतु वास्तव में उन दवाओं के सेवन से रोग घटने के स्थान पर बढ़ने लगता है क्योंकि वह किसी अन्य रूप में फिर सामने आ जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली में उत्तेजक और जहरीले दवाओं का सेवन नहीं कराया जाता बल्कि प्रकृति के पंच तत्वों के द्वारा उपचार से मनुष्य के शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकाल कर स्वस्थ किया जाता है।