चिकित्सक के रोगी के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए।

एक आदर्श चिकित्सक मानव को पीड़ा और कष्ट से मुक्ति देता है

एक चिकित्सक को लालच और स्वार्थ परता को ताक पर रखकर ही किसी रोगी  का इलाज करना चाहिए।

क्योंकि यह दोनों चीजें चिकित्सक के पवित्र कार्य में बिल्कुल ही असंगत है। यह डॉक्टरों के पवित्र कार्य पर कलंक का निशान लगाती हैं।

स्वार्थपरता और लालच हृदय को मैला कर देते हैं। इनमें मानसिक व्रतियों की पवित्रता नष्ट हो जाती है।

अतः ऐसा व्यक्ति धन उपार्जन तो कर सकता है पर एक अच्छा चिकित्सक नहीं बन सकता। एक आदर्श चिकित्सक मानव को पीड़ा और कष्ट से मुक्ति देता है और उसके दुखी जीवन को सुखी जीवन में बदलने का प्रयास करता है।

एक चिकित्सक को उदार और आजीवन दयालुता वाला होना चाहिये।

चिकित्सक रोगी के लिए मानव रूप में ईश्वर होता है।

चिकित्सक रोगी के पास दिव्य पुरुष बन कर आता है उस वक्त वह मानव रूप में ईश्वर होता है।

वैसे तो धर्मगुरु अध्यापक और चिकित्सक से मानवता पूर्ण होने की आशा की जाती है। यह व्यक्ति के जीवन में 3 प्रधान अंगों के रक्षक हैं।

धर्मगुरु मनुष्य की आत्मा को प्रकाशित करता है आध्यात्मिक मस्तिष्क में ज्योति भरता है। इनके अलावा चिकित्सक मनुष्य शरीर को सुगठित स्वस्थ और जीवनी शक्ति से परिपूरित करता है।

यही हमारी प्राचीन भारतीय चिकित्सकों का सिद्धांत था जिस पर चलकर और अटल रहकर चिकित्सक संसार की दुखी जनों का और साथ ही अपना भी कल्याण करता था।

एक चिकित्सक को आदर्श चरित्र वाला और विशुद्ध हृदय वाला चिकित्सा ज्ञान से परिपूर्ण मस्तिष्क वाला होना आवश्यक है।

सहानुभूति प्रदर्शित करने वाला अपने रोगी को अपनी संतान के समान समझने वाला मधुर वाणी वाला सद व्यवहार वाला होना नितांत आवश्यक है। अन्यथा वह न तो रोगी का भला कर सकता है और ना ही अपना।

चिकित्सक को रोगी का रोग वृतांत पहले उसके मुख से पूरे मनोयोग द्वारा सुन लेना चाहिए।

तत्पश्चात उसके समस्त शरीर का निरीक्षण करके यह पता लगाना चाहिए कि रोग क्या है रोग का कारण क्या है तथा उसमें कितना और किस तरफ और कितना पुराना या नया विजातीय द्रव्य विद्यमान है।

चिकित्सक का यह भी कर्तव्य है कि वह नए और पुराने रोगों के भेद को अच्छी तरह जाने।

समझदारी के साथ उपचार चलाकर एक होशियार प्राकृतिक चिकित्सक कोई भी पुराना रोग दूर कर सकता है

वह अपने रोगी के शरीर के विभिन्न रोगों के आने की शक्ति उत्पन्न कर सकता है जिसे वह उभाड़ नाम से जानता है और तीव्र लोगों के आने पर वह उनका उपचार तीव्र रोगों के उपचार की भांति करके रोगी को एकदम स्वस्थ कर देता है और उसे नया जन्म प्रदान कर देता है।

रोग नया हो या पुराना उसका कारण एक ही होता है अर्थात शरीर में दूषित द्रव्य की उपस्थिति।

अतः रोग के नामकरण की परवाह एक कुशल प्राकृतिक चिकित्सक कभी नहीं करता

उसे तो सिर्फ यह चिंता होती है कि रोगी के पेट और शरीर के विकार किस प्रकार निकले। सुषुप्त स्नायु संस्थान किस प्रकार जागृत हो। शरीर की जीवनी शक्ति कैसे बढे तथा रोगी प्रसन्न और आशावादी कैसे बने।

चिकित्सक को रोगी के संबंध में निम्न बातें भी जाने चाहिए

रोगी की जीवनी शक्ति बलवती है या निर्बल। विषैली दवाइयों तथा ऑपरेशन का व्यवहार तो नहीं हुआ है यदि हुआ है किस हद तक। रोगी की उम्र क्या है वजन क्या है लंबाई क्या है मानसिक अवस्था क्या है प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास है या नहीं।

जीवन यापन कैसा है व्यवसाय क्या है योगी विवाहित है या अविवाहित, रोग पैतृक है या नही, रोगी का रहन-सहन और खान-पान किस प्रकार का है इस बात की विशेष जानकारी प्राप्त कर ले।

चिकित्सा की शुरुआत भोजन सुधार के द्वारा

चिकित्सक का यह भी कर्तव्य है कि वह चिकित्सा की शुरुआत भोजन सुधार के द्वारा किया जाए जिससे कि परिणाम निश्चित ही अच्छे आए।

चिकित्सक रोगी के बारे में यह भी पता करें, जो रोग गलत उपचार और औषधियों आदि से दबा दिया जाते हैं तो पुराने हो जाते हैं और शरीर में बीज रूप में विद्यमान रहते हैं।

एक प्राकृतिक चिकित्सक को ऐसे दबे हुए रोगों की चिकित्सा करने के लिए सर्वप्रथम उन्हें तरकीब से हटाना पड़ता है और तब प्राकृतिक उपायों से उन्हें धीरे-धीरे मिटाया जाता है।

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