बवासीर पाइल्स सभ्य समाज का रोग है

बवासीर की आरंभिक अवस्था में गुदाद्वार की भीतरी और बाहरी नसों में खुजली और जलन महसूस होती है।

जलन कभी भीतरी नस में होती है कभी बाहर ही नस में। जिस जगह जलन और खुजली होती है वहां बिना मुंह के फोड़े की जैसी छोटी-छोटी गांठ जिनको मस्से भी कहते हैं निकल आते हैं जो आगे चलकर काफी बड़े हो जाते हैं।

यही जब फट जाते हैं और उनसे खून निकलने लगता है तो इसे बवासीर खूनी कहते हैं। और जब खून नहीं निकलता है उस स्थिति में बादी बवासीर कहते हैं।

बवासीर कोई रोग नहीं है अपितु रोग का एक लक्षण है


बवासीर रोग सभ्य समाज का रोग है। मैदा, डबल रोट, डिब्बाबंद, पैक्ड फ़ूड, अत्यधिक तेज मसाले, अधिक तली हुई खाद्य पदार्थ प्रयोग करने से पेट साफ नहीं होता और कब्ज जब बराबर बना रहता है तब आंतो में उसकी सड़न से गर्मी बढ़ जाती है, जिसके फलस्वरूप आंतों की झिल्ली कमजोर हो जाती है।

गुदा स्थान में भारीपन का अनुभव होता है


मलत्याग में कठिनाई और कष्ट होता है तथा उसके पास की नसों की अंतिम छोर में दूषित रक्त इकट्ठा हो जाने से धीरे-धीरे गंदा मास का निर्माण होता चला जाता है यही बवासीर है।

गुदा के पास की नसें शरीर की एक लंबी रक्त वाहिका का सबसे निचला हिस्सा है जिस पर मार्ग की पेशियां असाधारण अवस्था में अनावश्यक दबाव डालकर उन शिरों के रुधिर प्रवाह में रूकावट डालती है।

शरीर में विजातीय द्रव्य की मात्रा अधिक हो चुकी है


गुदा पर ये मस्से इस बात को प्रकट करते हैं कि शरीर में विजातीय द्रव्य की मात्रा अधिक हो चुकी है रक्त दूषित हो चुका है तथा पेट में मल भरकर पुराना पड़ चुका है।

इस कथन से स्पष्ट है कि बवासीर का मूल कारण कब्ज के कारणों से भी गहरा है। बवासीर के कारणों में से कब्ज होना सिर्फ एक कारण है क्योंकि हर कब्ज के रोगी को बवासीर नहीं होती परंतु बवासीर के रोगी को कब्ज होना जरूरी होता है।

बवासीर के अन्य कारणों में लीवर की खराबी पेट की खराबी और किसी भी प्रकार का रक्त विकार आदि हो सकते हैं।

बवासीर की तकलीफ जड़ से दूर करने के लिए


यह आवश्यक है कि कब्ज को सबसे पहले दूर किया जाए और फिर उसे कभी ना होने दिया जाए। कब्ज दूर करने का निश्चित उपाय किया जाए।

पुराना बवासीर सारे शरीर की स्थिति के सुधार होने पर ही जाता है अर्थात कहने का मतलब यह है कि बवासीर को ठीक करना है तो संपूर्ण शरीर को स्वस्थ करना होगा उसके बाद वह अपने आप ही ठीक हो जाएगा।

बवासीर के रोगी की आंतें बहुत कमजोर हो जाती हैं। बबासीर के रोगी को ऐसे खाद्य पदार्थ देने चाहिए जिनसे कब्ज दूर हो साथ ही मल भी मुलायम बने जिससे कि वह बिना तकलीफ दिए गुदा मार्ग से बाहर हो जाए।

सबसे पहले आपको अपना खानपान ठीक करना होगा।


सलाद, रसदार फल या उसका रस, तरकारी या उसके सूप की अधिकता हो जिसमें ऊपर से पानी मिलाने या पीने की आवश्यकता ना हो जिससे यह लाभ है कि तरल पदार्थ शुद्ध रूप में प्राप्त हो जाता है।

यह इस प्रकार का आहार कुछ दिनों तक चलाते रहने पर रोग उत्पन्न करने वाली स्थिति बहुत कुछ दूर हो जाएगी और यदि रोग आरंभिक अवस्था में होगा तो वह अच्छा भी हो जाएगा। ऐसे रोगी एनिमा भी लेना चाहिए।

खाने-पीने में गेहूं का दलिया, चोकर समेत आटे की रोटी, पालक, बथुआ तोरई, परवल, मूली पत्ता गोभी हरा, पपीता आदि सभी साग सब्जियां, पका पपीता, सेव, नाशपाती, मट्ठा, दूध किशमिश, मुनक्का, आलूबुखारा, अंजीर, कच्चा नारियल ले सकते हैं।दाल और उत्तेजक खाद्य पदार्थ, पैक्ड फ़ूड एकदम से त्याग कर देना चाहिए।

पुरानी बवासीर में जिसमें आंतों की गर्मी के कारण मल कड़ा हो जाता है कुछ दिनों तक प्रत्येक भोजन के साथ ईसबगोल की भूसी का प्रयोग करना चाहिए।

बवासीर को ठीक करने में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सबसे पहले आपको अपना खानपान ठीक करना होगा। उसके बाद दैनिक दिनचर्या को व्यवस्थित करना होगा।

खानपान में बहुत ही सात्विक प्रकृति का भोजन लेना होगा और सलाद फल आदि का प्रयोग अधिकतम कर के भोजन कम करना होगा। भोजन को खूब चबा चबाकर आराम और तसल्ली से करना चाहिए।

बवासीर को पूर्ण रूप से ठीक किया जा सकता है बिना किसी औषधि के यदि आप अपनी दिनचर्या को और खानपान को सुव्यवस्थित करलें तो निश्चित ही बवासीर में पूर्ण आराम मिलेगा।

दवा से ज्यादा जरूरी है सही दिनचर्या

मानव ही ऐसा है जिसको भोजन की पहचान करानी पड़ती है